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Geological Cycle और Weathering

 Soil Definition / मिट्टी की परिभाषा

  • Engineering Definition of Soil / इंजीनियरिंग के अनुसार मिट्टी: सिविल इंजीनियर्स के लिए, चट्टानों के टूटने से बना वह ढीला या अन-सॉलिड मटेरियल (Unconsolidated Material) ही मिट्टी है, जिस पर किसी भी बिल्डिंग, रोड या ब्रिज की नींव (Foundation) रखी जाती है। इस ढीले पदार्थ में ठोस कणों (solid particles) के साथ-साथ हवा और पानी भी मिक्स होते हैं। 
Geological Cycle of Soil / भूवैज्ञानिक चक्र 
प्रकृति में चट्टान से मिट्टी बनने और मिट्टी से दोबारा चट्टान बनने की यह प्रक्रिया हमेशा एक गोल चक्र में चलती रहती है। 

यह प्रकृति का वह 5-स्टेप का चक्र (Cycle) है जिससे चट्टान से मिट्टी बनती है:
  • 1. Rock (चट्टान): शुरुआत एक मजबूत और ठोस पत्थर या चट्टान से होती है।
  • 2. Weathering (अपक्षय): धूप, हवा और पानी की मार से यह चट्टान छोटे-छोटे कणों में टूट जाती है
  • 3. Transportation (परिवहन): टूटे हुए यह बारीक कण हवा या नदी के पानी के साथ बहकर एक जगह से दूसरी जगह जाते हैं
  • 4. Deposition (जमाव): बहकर आए हुए यह कण किसी नीची जगह या नदी के किनारे धीरे-धीरे जमा (इकट्ठा) होने लगते हैं और मिट्टी की परत बनाते हैं।
  • 5. Upheaving (उत्थान): लाखों सालों बाद, जमीन के अंदर की हलचल के कारण यह जमा हुई मिट्टी ऊपर की तरफ उठती है और दोबारा ठोस चट्टान का रूप ले लेती है। 
अपक्षय (Weathering) 

1. Physical or Mechanical Weathering / भौतिक या यांत्रिक अपक्षय
  • सरल शब्दों में: जब कोई चट्टान बिना अपना केमिकल रूप बदले, सिर्फ ताकत या प्रेशर की वजह से भौतिक रूप से छोटे टुकड़ों में टूट जाती है, तो उसे भौतिक अपक्षय कहते हैं। इसमें बड़े पत्थर के सिर्फ छोटे-छोटे टुकड़े होते हैं, कोई नया मटेरियल नहीं बनता। यह ठंडे और सूखे इलाकों में ज्यादा होता है।
  • यह कैसे होता है? (मुख्य कारण):
    • तापमान का बदलना (Thermal Expansion): रेगिस्तान जैसे इलाकों में दिन में बहुत तेज धूप से चट्टानें फैलती हैं और रात में ठंड से सिकुड़ती हैं। रोज-रोज फैलने और सिकुड़ने से चट्टानों में दरारें पड़ जाती हैं और वे प्याज के छिलके की तरह परत-दर-परत उखड़ने लगती हैं (Exfoliation).
    • बर्फ का जमना (Frost Wedging): पहाड़ों में जब चट्टानों की दरारों में पानी भर जाता है और रात में वह बर्फ बन जाता है, तो बर्फ फैलती है। बर्फ के फैलने से दरार पर भारी दबाव पड़ता है और चट्टान बीच से फट जाती है।

2. Chemical Weathering / रासायनिक अपक्षय
  • सरल शब्दों में: जब पानी, हवा या एसिड के संपर्क में आने से चट्टान के अंदर के खनिजों (minerals) का केमिकल रूप ही बदल जाता है, तो उसे रासायनिक अपक्षय कहते हैं। इसमें चट्टान अंदर से सड़कर या घुलकर कमजोर हो जाती है और एक नया पदार्थ (जैसे मिट्टी या क्ले) बना देती है। यह गर्म और नमी (rainy) वाले इलाकों में सबसे ज्यादा होता है।
  • यह कैसे होता है? (मुख्य कारण):
    • ऑक्सीकरण (Oxidation): जब चट्टान में मौजूद लोहे (iron) का संपर्क हवा की ऑक्सीजन और पानी से होता है, तो उसमें जंग (rust) लग जाती है. जंग लगने से मजबूत पत्थर भी भुरभुरा होकर टूटने लगता है।
    • कार्बोनेटीकरण (Carbonation): जब बारिश का पानी हवा की कार्बन डाइऑक्साइड से मिलता है, तो एक हल्का एसिड (Carbonic Acid) बनता है। यह एसिड चूना पत्थर (Limestone) जैसी चट्टानों को आसानी से घुला देता है, जिससे बड़ी-बड़ी गुफाएं बन जाती हैं।
    • जल-अपघटन (Hydrolysis): पानी के कण जब चट्टान के खनिजों के साथ रिएक्शन करते हैं, तो वे कड़े पत्थरों को नर्म चिकनी मिट्टी (Clay) में बदल देते हैं।

3. Biological Weathering / जैविक अपक्षय
  • सरल शब्दों में: जब पेड़-पौधे, जानवर या इंसान अपनी गतिविधियों से चट्टानों को तोड़ते हैं, तो उसे जैविक अपक्षय कहते हैं। यह भौतिक और रासायनिक दोनों तरह से हो सकता है।
  • यह कैसे होता है? (मुख्य कारण):
    • पेड़ की जड़ें (Plant Roots): जब किसी चट्टान की छोटी सी दरार में कोई पौधा उगता है, तो जैसे-जैसे उसकी जड़ें बड़ी और मोटी होती हैं, वे चट्टान पर इतना दबाव डालती हैं कि कड़ा पत्थर भी दो भागों में फट जाता है।
    • बिल बनाने वाले जानवर (Burrowing Animals): केंचुए, चूहे, खरगोश या चींटियां जमीन के अंदर बिल बनाने के लिए चट्टानों और मिट्टी को खोदकर कमजोर कर देते हैं, जिससे वे आसानी से टूट जाती हैं।
    • कीटाणु और लाइकेन (Microbes & Lichens): पत्थरों पर उगने वाले छोटे पौधे (लाइकेन) एक खास तरह का एसिड छोड़ते हैं, जो चट्टान की ऊपरी सतह को गलाकर खोखला कर देता है।



1. Geological Classification of Soil (मिट्टी का भूवैज्ञानिक वर्गीकरण)
उत्पत्ति (formation) के आधार पर मिट्टी को दो मुख्य भागों में बांटा गया है:
  • Residual Soils (अवशिष्ट मिट्टी): यह मिट्टी चट्टानों के टूटने (weathering) के बाद उसी जगह पर रुकी रहती है जहाँ इसका निर्माण हुआ है। यह अपने पैरेंट रॉक (मूल चट्टान) के ठीक ऊपर पाई जाती है।
  • Transported Soils (स्थानांतरित मिट्टी): यह मिट्टी अपने बनने की जगह से हवा, पानी, बर्फ या गुरुत्वाकर्षण (gravity) जैसे माध्यमों द्वारा बहकर किसी दूसरी जगह पर जमा हो जाती है।

2. Types of Transported Soils (स्थानांतरित मिट्टी के प्रकार)
  • Glacier Transported Soils (ग्लेशियर द्वारा लाई गई मिट्टी): बर्फ (ice) के खिसकने से बनने वाली मिट्टी।
    • Moraine: ग्लेशियर द्वारा सीधे जमा की गई मिट्टी।
    • Till: मिट्टी, क्ले और सिल्ट का मिला-जुला मिश्रण जो बर्फ द्वारा जमा होता है।
    • Drift / Glaciofluvial: ग्लेशियर के पिघले हुए पानी द्वारा बहाकर जमा की गई परतदार मिट्टी।
  • Water Transported Soils (पानी द्वारा लाई गई मिट्टी): बहते पानी या नदियों द्वारा जमा की जाने वाली मिट्टी।
    • Alluvial Soil (जलोढ़ मिट्टी): नदियों के बहते पानी द्वारा मैदानी इलाकों में जमा मिट्टी।
    • Lacustrine Soil: झीलों (lakes) के शांत पानी की तली में जमा होने वाली मिट्टी।
    • Marine Soil: समुद्र के पानी द्वारा किनारों पर जमा की जाने वाली बहुत मुलायम मिट्टी।
  • Wind Transported / Aeolian Soils (हवा द्वारा लाई गई मिट्टी): तेज हवा या आंधी द्वारा उड़कर जमा होने वाली मिट्टी।
    • Loess: हवा द्वारा उड़कर दूर जमा हुई सिल्ट की मोटी परत (यह सूखी होने पर मजबूत होती है, लेकिन भीगने पर धंस जाती है)।
    • Sand Dunes: रेगिस्तान में हवा के कारण बनने वाले रेत के टीले।
  • Gravity Deposited / Colluvial Soils (गुरुत्वाकर्षण द्वारा जमा मिट्टी): पहाड़ों की ढलान से गुरुत्वाकर्षण के कारण नीचे गिरकर इकट्ठा होने वाले चट्टानों के टुकड़े या मिट्टी (जैसे- Landslide से बनी मिट्टी)।

3. Soil Profile (मृदा परिच्छेदिका)
जमीन को ऊपर से नीचे तक सीधा (vertical) काटने पर जो अलग-अलग परतें (layers) दिखाई देती हैं, उन्हें Horizons कहते हैं। मुख्य परतें निम्नलिखित हैं:
  • O-Horizon (ओ-परत): सबसे ऊपरी परत, जिसमें सड़ने वाले पेड़-पौधे और जैविक पदार्थ (Organic Matter/Humus) होते हैं।
  • A-Horizon (ए-परत): असली खनिज मिट्टी की शुरुआत यहीं से होती है। इसका रंग गहरा (dark) होता है क्योंकि इसमें ह्यूमस मिला होता है। (मोटाई: 25 से 30 cm)
  • B-Horizon (बी-परत): इसे 'Sub-soil' भी कहते हैं। ऊपर से छनकर आने वाले बारीक कण और कैल्शियम कार्बोनेट इस परत में जमा हो जाते हैं। (मोटाई: 10 से 240 cm)
  • C-Horizon (सी-परत): यह मूल चट्टान (Parent Rock) का आंशिक रूप से टूटा हुआ हिस्सा है। इंजीनियरिंग के काम में बेस बनाने के लिए यह बहुत काम आती है।
  • R-Horizon: यह सबसे नीचे की मजबूत और बिना टूटी हुई ठोस चट्टान (Bedrock) होती है।
Significance (महत्व): सॉइल प्रोफाइल से हमें मिट्टी की मोटाई, वाटर टेबल (पानी का स्तर) की गहराई और फाउंडेशन (नींव) की गहराई तय करने में मदद मिलती है।

4. Difference between Clay and Sand (क्ले और सैंड में अंतर)
गुण (Properties)क्ले (Clay)सैंड (Sand)
कणों का आकार (Particle Size)बहुत बारीक (0.002 mm से कम)मोटा (0.075 mm से 4.75 mm)
पारगम्यता (Permeability)बहुत कम (पानी आसानी से नहीं निकलता)बहुत अधिक (पानी तुरंत बह जाता है)
संपीड़न (Compressibility)बहुत अधिक (दबाने पर ज्यादा दबती है)बहुत कम
संसजकता (Cohesion)अत्यधिक चिपचिपी (Cohesive)चिपचिपाहट रहित (Cohesionless)
सूखने पर सिकुड़नाबहुत ज्यादा सिकुड़ती हैना के बराबर

5. Major Soils of India (भारत की मुख्य मिट्टियाँ)
  • Alluvial Soil (जलोढ़ मिट्टी): यह भारत के उत्तरी मैदानों (U.P., बिहार, पंजाब आदि) में पाई जाती है। यह बेहद उपजाऊ है और फसलों के लिए सबसे अच्छी मानी जाती है।
  • Black Cotton Soil / Regur (काली मिट्टी): यह मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र और गुजरात के ज्वालामुखी क्षेत्रों में मिलती है। यह कपास (Cotton) की खेती के लिए सबसे उत्तम है। यह सूखने पर सिकुड़ती है और गीली होने पर बहुत फूलती है, इसलिए यह कंस्ट्रक्शन (निर्माण कार्य) के लिए अच्छी नहीं मानी जाती।
  • Desert Soil (मरुस्थलीय मिट्टी): यह मुख्य रूप से राजस्थान में पाई जाने वाली रेतीली मिट्टी है। पानी की कमी के कारण यह खेती के लिए उपयुक्त नहीं है।
  • Red Soil (लाल मिट्टी): यह उड़ीसा, तमिलनाडु और कर्नाटक में पाई जाती है। आयरन (लोहे) के फैलाव के कारण इसका रंग लाल होता है। यह ज्यादा उपजाऊ नहीं होती।
  • Hill Soil (पहाड़ी मिट्टी): यह हिमालय और अन्य पहाड़ी क्षेत्रों में पाई जाती है। इसमें जंगलों की सड़ी-गली पत्तियों के कारण ह्यूमस की मात्रा अधिक होती ह 

मुख्य कारणपत्थरों के साथ क्या होता है?

धूप, ठंड, बर्फ का दबावपत्थर बिना रूप बदले सिर्फ छोटे टुकड़ों में टूटता है।

पानी, ऑक्सीजन, एसिडपत्थर के अंदर के मिनरल्स बदल जाते हैं और वह गल जाता है।

पेड़ की जड़ें, जानवर, कीड़ेसजीवों के कारण पत्थर टूटते या सड़ते हैं।

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