Skip to main content

Chaining on sloping ground

  Chaining on Sloping Ground (Simple Notes) When measuring distances on a hill or slope, we always need to find the flat horizontal distance , not the actual sloped ground distance. There are two main ways to do this: 1. Direct Method (Stepping Method) In this method, you measure the flat horizontal distance directly on the field by creating small, flat steps. Best For: Short, bumpy, irregular, or gentle slopes. How it works (Step-by-Step): Start: The Follower holds the 0-end of the tape flat on the starting ground point A. Stretch: The Leader pulls a short, comfortable length of the tape forward and lifts it up until it looks perfectly flat and straight by eye judgment. Drop: Because the front end of the tape is hanging in the air, the Leader drops a plumb-bob (a weight on a string) down to find the exact vertical point on the ground. Mark & Repeat: They stick an arrow into that ground point. The Follower moves to this new arrow, and they repeat the steps all the way u...

Soil Mechanics in Civil Engineering | Shear Strength, Angle of Repose, Coulomb’s Law Explained in Hindi

 

Shear Strength of Soil क्या होती है? 

👉 Shear Strength (कतरनी शक्ति) का मतलब होता है —
मिट्टी की वह क्षमता जिससे वह फिसलने (Slip) या टूटने (Failure) से खुद को रोकती है।

यानि जब मिट्टी पर कोई भार (load) या दबाव (pressure) आता है,
तो वह या तो टिके रहती है (Stable)
या खिसक जाती है (Failure)।
मिट्टी के खिसकने से बचने की क्षमता ही उसकी Shear Strength कहलाती है।


उदाहरण से समझो:

मान लो दो ढेर मिट्टी के हैं —

  1. सूखी रेतीली मिट्टी

  2. गीली चिकनी मिट्टी

  • अगर आप सूखी रेतीली मिट्टी पर पैर रखो तो वो फौरन फिसल जाती है — यानी उसकी shear strength कम है।

  • लेकिन अगर वही मिट्टी थोड़ी गीली हो जाए तो थोड़ी चिपकने लगती है — यानी उसकी shear strength बढ़ जाती है।


मिट्टी में Shear Strength कहाँ काम आती है:

  1. नींव (Foundation) को भार सहने में

  2. ढलानों (Slopes) या पहाड़ियों को फिसलने से रोकने में

  3. Retaining wall के पीछे मिट्टी को थामे रखने में

  4. Roads, embankments, dams आदि के डिज़ाइन में


Shear Strength किन बातों पर निर्भर करती है:

  1. Cohesion (चिपकने की शक्ति) —
    मिट्टी के कणों के बीच चिपकने की क्षमता।
    यह खासकर चिकनी मिट्टी (Clay) में ज्यादा होती है।

  2. Internal friction (आंतरिक घर्षण कोण φ) —
    जब मिट्टी के कण एक-दूसरे पर फिसलते हैं तो जो रगड़ होती है,
    वही उसकी आंतरिक घर्षण कहलाती है।
    यह रेतीली मिट्टी में ज्यादा होती है।


Shear Strength का सूत्र (Mohr–Coulomb Equation):

τ=c+σtan⁡ϕ\tau = c + \sigma \tan\phi

जहाँ,

  • τ = Shear strength (कतरनी शक्ति)

  • c = Cohesion (चिपकने की शक्ति)

  • σ = Normal stress (सामान्य दबाव)

  • φ = Angle of internal friction (आंतरिक घर्षण कोण)


मुख्य बातें याद रखने योग्य:

प्रकारप्रमुख कारणउदाहरण
Cohesive strengthमिट्टी के कणों की चिपकने की प्रवृत्तिClay soil
Frictional strengthकणों के बीच रगड़Sand soil

Shear Strength निकालने के प्रयोग (Tests):

  1. Direct Shear Test – सबसे आसान और सामान्य टेस्ट

  2. Triaxial Compression Test – सटीक और आधुनिक तरीका

  3. Unconfined Compression Test (UCC) – केवल Clay के लिए

  4. Vane Shear Test – Soft clay के लिए (Field test)


निष्कर्ष (Conclusion):

मिट्टी की Shear Strength बताती है कि
वह भार, दाब या बल लगने पर फिसलेगी या स्थिर रहेगी।
यह मिट्टी की स्थिरता (stability), ढलान, नींव और संरचनाओं की सुरक्षा के लिए बहुत महत्वपूर्ण गुण है। 

मिट्टी की shear strength के दो मुख्य घटक (components) होते हैं —

  1. Cohesion (c) –
    Cohesion वह बल है जो मिट्टी के कणों को आपस में जोड़कर रखता है। यह खासकर clay soil (चिकनी मिट्टी) में पाया जाता है। Cohesion मिट्टी को मजबूती देता है, जिससे वह बिना टूटे कुछ भार सह सकती है।

  2. Internal Friction (ϕ) –
    यह वह घर्षण है जो मिट्टी के कणों के बीच उनके संपर्क से उत्पन्न होता है। यह बल sandy soil (रेतीली मिट्टी) में ज़्यादा होता है। जब मिट्टी पर लोड लगता है तो कण एक-दूसरे पर फिसलने की कोशिश करते हैं, लेकिन यह friction उन्हें रोकता है।

👉 इसलिए कुल shear strength (τ) का सूत्र होता है:
τ = c + σ tanϕ
जहाँ σ = normal stress, c = cohesion, और ϕ = angle of internal friction.

इस प्रकार, cohesion और internal friction — मिट्टी की shear strength के दो सबसे महत्वपूर्ण घटकl 

 सिविल इंजीनियरिंग में shear strength के मुख्य उपयोग 


फाउंडेशन डिज़ाइन (Foundation Design) –

किसी भी बिल्डिंग या पुल की नींव (foundation) बनाने से पहले यह जांचना ज़रूरी है कि नीचे की मिट्टी कितनी मजबूत है। Shear strength से पता चलता है कि मिट्टी foundation के भार को झेल सकती है या नहीं।


ढलानों की स्थिरता (Slope Stability) –

पहाड़ी क्षेत्रों में सड़कें, डैम या कटिंग बनाते समय slope के फिसलने (landslide) का खतरा होता है। Shear strength यह तय करने में मदद करती है कि ढलान सुरक्षित है या नहीं।

Retaining Wall Design (रिटेनिंग वॉल डिज़ाइन) –

Retaining wall के पीछे की मिट्टी दबाव डालती है। उस मिट्टी की shear strength जानकर ही दीवार की मोटाई और मजबूती तय की जाती है।

Roads और Embankments (सड़कें व बांध) –

मिट्टी की strength देखकर तय किया जाता है कि वह सड़क या बांध का भार सह पाएगी या नहीं। 

विश्राम कोण (Angle of Repose)

विश्राम कोण वह अधिकतम कोण है जिस पर कोई ढीली मिट्टी, रेत या अन्य दानेदार पदार्थ खुद-ब-खुद फिसले बिना ढेर बनाकर टिक सकता है।

 सरल भाषा में:

जब आप रेत या मिट्टी का ढेर बनाते हैं, तो वह ढेर किसी स्थिर झुकाव (slope) पर टिकता है। उस झुकाव का कोण ही विश्राम कोण कहलाता है।

मुख्य बातें:

यह कोण मिट्टी या रेत के प्रकार पर निर्भर करता है।

रेत (Sand) ≈ 30°–35°

चिकनी मिट्टी (Clay) ≈ 15°–25°

यह material की स्थिरता बताता है।

सिविल इंजीनियरिंग में उपयोग:

ढलानों (Slopes) की सुरक्षा

Embankments और Retaining walls डिजाइन

विश्राम कोण जितना बड़ा, सामग्री उतनी ही स्थिर होती है। 

Coulomb’s Law in Soil Mechanics (कूलॉम का नियम – मिट्टी यांत्रिकी में)

Soil Mechanics में Coulomb’s Law का प्रयोग मिट्टी की shear strength (कतरनी ताकत) समझाने के लिए किया जाता है।

👉 Coulomb ने बताया था कि जब मिट्टी पर कोई भार लगता है, तो वह दो ताकतों की वजह से टूटती या फिसलती है —

  1. Cohesion (c) – मिट्टी के कणों का आपसी जुड़ाव

  2. Friction (ϕ) – कणों के बीच का घर्षण

Coulomb के अनुसार, मिट्टी की कुल shear strength (τ) इन दोनों पर निर्भर करती है।

सूत्र:

τ=c+σtan⁡ϕ\tau = c + \sigma \tan \phi

जहाँ —

  • τ (Tau) = कुल shear strength

  • c = Cohesion

  • σ (Sigma) = Normal stress (ऊपर से लगने वाला दबाव)

  • ϕ (Phi) = Internal friction angle


💡 सरल शब्दों में:
Coulomb ने कहा कि मिट्टी की ताकत दो चीज़ों पर निर्भर करती है —

  • मिट्टी के कण कितने जुड़े हैं (Cohesion),

  • और वे एक-दूसरे पर कितना रगड़ पैदा करते हैं (Friction)।

यानी जब तक ये दोनों बल मिट्टी में मौजूद हैं, मिट्टी आसानी से नहीं फिसलेगी या टूटेगी।

 कूलम्ब का संशोधित नियम 
टरजागी ने 1936 मे कूलम्ब के नियम में  संसोधन किया , क्योंकि कूलम्ब के सिद्धान्त से सरचनाओ मे विफलता आ जाती है। 

Coulomb का संशोधित नियम — Terzaghi के अनुसार (In Soil Mechanics)

🔹 पृष्ठभूमि (Background):

Coulomb ने सबसे पहले shear strength (कतरनी बल) को समझाने के लिए अपने सिद्धांत का उपयोग किया था।
लेकिन बाद में Karl Terzaghi ने इसे मिट्टी (soil) के लिए संशोधित किया, क्योंकि मिट्टी एक ठोस पदार्थ नहीं बल्कि frictional + cohesive material होती है।


⚙️ Terzaghi का संशोधित नियम (Modified Coulomb’s Equation):

τ=c+σtan⁡ϕ\tau = c + \sigma \tan \phi

जहाँ,

  • τ\tau = shear strength (कतरनी बल)

  • cc = cohesion (संयोजन बल)

  • σ\sigma = normal stress (सामान्य तनाव)

  • ϕ\phi = angle of internal friction (आंतरिक घर्षण कोण)


🧠 Terzaghi का संशोधन क्या था?

  1. Coulomb ने सिर्फ घर्षण (friction) को ध्यान में रखा था।

  2. Terzaghi ने मिट्टी में मौजूद cohesion (संयोजन बल) को भी शामिल किया।

  3. इस तरह उन्होंने बताया कि मिट्टी की shear strength दो भागों से मिलकर बनती है —

    • Cohesion (c)

    • Frictional resistance (σ tan φ)


🌾 Terzaghi का Coulomb Theory में सुधार:

CoulombTerzaghi
केवल घर्षण बल को मानता हैCohesion + Friction दोनों को मानता है
Dry sand के लिए ठीकClay और cohesive soil के लिए भी लागू
Purely theoreticalExperimentally verified

📘 Short Exam-Oriented Definition:

“Terzaghi ने Coulomb के shear strength नियम को संशोधित कर बताया कि मिट्टी की कुल कतरनी शक्ति (Shear Strength) उसके संयोजन बल (C) और आंतरिक घर्षण कोण (φ) पर निर्भर करती है।”


✍️ Final Formula (Exam Point):

τ=c+σtan⁡ϕ\boxed{\tau = c + \sigma \tan \phi}

Comments

Popular posts from this blog

Jarib , pictures, photo,जरीब का चित्र, chain survey,Part3 जरीब सर्वेक्षण chain survey

  जरीब सर्वेक्षण (Chain Survey) | सिद्धांत, प्रकार, फीता और उपकरण  Introduction सर्वेक्षण (Surveying) सिविल इंजीनियरिंग का एक महत्वपूर्ण भाग है। इसमें क्षेत्र की दूरी, दिशा और सीमाओं को मापा जाता है। जरीब सर्वेक्षण (Chain Survey) सबसे सरल और प्राचीन तकनीक है, जिसमें जरीब या फीता का उपयोग किया जाता है।  जरीब (Chain) क्या है? जरीब एक यांत्रिक उपकरण है जिसका उपयोग रेखीय दूरी नापने (Linear Measurement) के लिए किया जाता है। यह जस्तीकृत मृदु इस्पात की कड़ियों से बनी होती है। दोनों सिरों पर पीतल के हत्थे (Handles) लगे होते हैं। यह छोटे और समतल क्षेत्रों के सर्वेक्षण के लिए उपयुक्त है।  जरीब को चेन सर्वे (Chain Survey) में मुख्य उपकरण माना जाता है।  फीता (Tape) क्या है? फीता (Tape) भी दूरी मापने का उपकरण है लेकिन इसमें कड़ियाँ नहीं होतीं। यह जरीब से हल्का और अधिक शुद्ध (Accurate) होता है। इसे कई प्रकार के पदार्थों से बनाया जाता है: सूती फीता (Cotton Tape) मेटलिक फीता (Metallic Tape) इस्पाती फीता (Steel Tape) इन्वार फीता (Invar Tape) ...

Surveying in Civil Engineering: सर्वेक्षण क्या है? Types, Principles & Uses

सिविल इंजीनियरिंग में सर्वेक्षण (Surveying in Civil Engineering) सर्वेक्षण क्या है? (What is Surveying?) Surveying in Civil Engineering सिविल इंजीनियरिंग की एक महत्वपूर्ण शाखा है, जिसमें भूमि पर स्थित विभिन्न बिंदुओं की दूरी, कोण, ऊँचाई और स्थिति का मापन करके नक्शा (Map) तथा निर्माण कार्य के लिए आवश्यक डेटा तैयार किया जाता है। Surveying का उपयोग सड़क, पुल, रेलवे, नहर, भवन और अन्य निर्माण परियोजनाओं में किया जाता है। सर्वेक्षण का उद्देश्य (Purpose of Surveying) सटीक नक्शा और योजना बनाना – टोपोग्राफिकल और कैडस्ट्रल नक्शा तैयार करना। निर्माण स्थल का चयन – सड़क, रेलवे, पाइपलाइन और सीवर लाइन के लिए उचित स्थल चुनना। बिंदुओं की स्थिति ज्ञात करना – प्राकृतिक और कृत्रिम बिंदुओं की स्थिति मापना। ऊंचाई और गहराई मापन – भूमि की स्थलाकृति और ऊंचाई निर्धारण। निर्माण कार्यों के लिए लेआउट बनाना – भवन, पुल, नहर आदि के लिए मार्किंग। भूमि की सीमाओं का निर्धारण – संपत्ति और कानूनी उद्देश्यों के लिए। मिट्टी की कटाई और भराई का परिमाण – निर्माण में आवश्यक माप। सर्वेक्षण का वर्गीक...

Contour (कॉन्टूर) क्या है? | Types, Uses, Importance of Contour in Surveying – Civil Engineering Notes in Hindi

  Contour क्या होता है कॉनटूर (Contour) शब्द का प्रयोग सर्वेक्षण (Surveying) में बहुत आम है। यह शब्द जमीन की ऊँचाई और ढाल (slope) को दिखाने के लिए इस्तेमाल किया जाता है। कॉनटूर लाइनों की मदद से हम किसी इलाके की सतह (surface) को 3-D रूप में समझ सकते हैं — यानी बिना उस जगह पर जाए यह पता लगाया जा सकता है कि जमीन ऊँची है या नीची।   कॉनटूर की परिभाषा (Definition of Contour) कॉनटूर (Contour) एक काल्पनिक रेखा (Imaginary Line) होती है जो उन सभी बिंदुओं (points) को जोड़ती है जिनकी ऊँचाई (elevation) समुद्र तल (mean sea level) से बराबर होती है । उदाहरण: अगर किसी क्षेत्र में 100 मीटर ऊँचाई वाले सारे बिंदुओं को जोड़ दिया जाए, तो वह रेखा 100 मीटर की कॉनटूर लाइन कहलाएगी। इसका मतलब यह कि उस लाइन पर आने वाले हर बिंदु की ऊँचाई 100 मीटर है। कॉनटूर का उद्देश्य (Purpose of Contour Map) कॉनटूर लाइनों का मुख्य उद्देश्य है — जमीन के प्राकृतिक आकार (shape) और ढाल को दिखाना ताकि इंजीनियर और सर्वेयर उस क्षेत्र की सही योजना बना सकें। मुख्य उद्देश्य: जमीन के आकार और ढाल को समझना। ...