क्रियात्मक शोध (Action Research) क्या है?
क्रियात्मक शोध वह शोध है जो शिक्षक खुद अपने काम को सुधारने के लिए करता है।
यानि — जब कोई शिक्षक यह देखता है कि कक्षा में कोई समस्या है (जैसे बच्चे ध्यान नहीं देते, या गणित में कमजोर हैं),
तो वह उस समस्या को हल करने के लिए छोटा-सा प्रयोग करता है — यही क्रियात्मक शोध कहलाता है।
📘 क्रियात्मक शोध के चार क्षेत्र (चार मुख्य क्षेत्र)
-
शिक्षण प्रक्रिया (Teaching Process)
👉 इसमें शिक्षक अपने पढ़ाने के तरीकों को सुधारने की कोशिश करता है।
उदाहरण:-
बच्चे पढ़ाई में ध्यान नहीं देते → नई रोचक विधि अपनाई।
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गणित को आसान बनाने के लिए चार्ट और मॉडल का प्रयोग किया।
-
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विद्यालय प्रबंधन (School Management)
👉 इसमें स्कूल की व्यवस्था और अनुशासन से जुड़ी समस्याओं पर शोध किया जाता है।
उदाहरण:-
स्कूल में देर से आने वाले बच्चों की संख्या कैसे घटाई जाए।
-
सफाई और अनुशासन बनाए रखने के तरीके।
-
-
पाठ्यक्रम और मूल्यांकन (Curriculum and Evaluation)
👉 इसमें पाठ्यक्रम (syllabus) और परीक्षा या मूल्यांकन प्रणाली को बेहतर बनाने पर काम होता है।
उदाहरण:-
बच्चों के स्तर के अनुसार पाठ्यक्रम बनाना।
-
मौखिक परीक्षा को अधिक प्रभावी बनाना।
-
-
शिक्षार्थी व्यवहार (Learner’s Behaviour)
👉 इसमें बच्चों के व्यवहार, रुचि, प्रेरणा और आदतों से जुड़ी समस्याओं पर शोध किया जाता है।
उदाहरण:-
बच्चा पढ़ाई में रुचि क्यों नहीं लेता?
-
झूठ बोलने या डरने की आदत कैसे बदले?
-
🪶 संक्षेप में याद रखने योग्य बिंदु:
| क्रमांक | क्रियात्मक शोध का क्षेत्र | सरल उदाहरण |
|---|---|---|
| 1 | शिक्षण प्रक्रिया | पढ़ाने की विधि सुधारना |
| 2 | विद्यालय प्रबंधन | अनुशासन बनाए रखना |
| 3 | पाठ्यक्रम व मूल्यांकन | परीक्षा प्रणाली सुधारना |
| 4 | शिक्षार्थी व्यवहार | बच्चों के व्यवहार में सुधार |
🌿 शैक्षिक नवाचार क्या होता है?
“शैक्षिक नवाचार” का मतलब है —
शिक्षा में कुछ नया करना या नया तरीका अपनाना ताकि पढ़ाई और सिखाने का तरीका बेहतर बन सके।
जैसे —
-
नई तकनीक (Smart Class, Digital Board) का उपयोग,
-
नई शिक्षण विधि अपनाना (Activity-based learning),
-
बच्चों की रुचि के अनुसार पढ़ाना आदि।
📘 शैक्षिक नवाचार का महत्व (Importance of Educational Innovation)
-
पढ़ाई को रोचक बनाता है 🎨
→ नए तरीके अपनाने से बच्चे बोर नहीं होते और मज़े से सीखते हैं। -
सीखने की गुणवत्ता बढ़ाता है 📚
→ बच्चे विषय को अच्छे से समझते हैं और लंबे समय तक याद रखते हैं। -
शिक्षक की कार्यक्षमता बढ़ती है 👩🏫
→ शिक्षक नए प्रयोगों से बेहतर तरीके से पढ़ा पाते हैं। -
बच्चों की सोच और रचनात्मकता बढ़ती है 💡
→ बच्चे सिर्फ याद नहीं करते बल्कि खुद सोचने लगते हैं। -
समस्या समाधान में मदद करता है 🧩
→ कक्षा या स्कूल की कठिनाइयों का नया हल मिल जाता है। -
समय के साथ शिक्षा को आधुनिक बनाता है ⚙️
→ जैसे-जैसे समाज बदलता है, वैसे-वैसे शिक्षा भी आगे बढ़ती है।
🪶 संक्षेप में याद रखने योग्य वाक्य (Short Notes for Exam)
शैक्षिक नवाचार का महत्व यह है कि इससे शिक्षा की गुणवत्ता, शिक्षक की दक्षता और विद्यार्थियों की रुचि — तीनों बढ़ती हैं।
यह शिक्षा को आधुनिक, उपयोगी और प्रभावशाली बनाता है।
शैक्षिक नवाचार का अर्थ (Meaning of Educational Innovation)
“शैक्षिक नवाचार” का अर्थ है —
शिक्षा के क्षेत्र में नए विचारों, तरीकों, तकनीकों या उपकरणों का प्रयोग करना ताकि शिक्षण और अधिगम प्रक्रिया को अधिक प्रभावशाली, रोचक और उपयोगी बनाया जा सके।
यानि, जब कोई शिक्षक या संस्था पारंपरिक तरीकों से हटकर कुछ नया तरीका अपनाती है जिससे बच्चों में सीखने की रुचि और परिणाम दोनों बेहतर हों —
तो उसे शैक्षिक नवाचार कहते हैं।
📘 शैक्षिक नवाचार का महत्व (Importance of Educational Innovation)
1. शिक्षण प्रक्रिया को प्रभावशाली बनाता है
नए-नए तरीकों (जैसे – प्रोजेक्ट विधि, गतिविधि आधारित शिक्षा, डिजिटल शिक्षण आदि) से पढ़ाने पर बच्चे विषय को आसानी से समझते हैं।
इससे कक्षा में सहभागिता और सीखने का स्तर दोनों बढ़ते हैं।
2. विद्यार्थियों की रुचि और भागीदारी बढ़ाता है
पारंपरिक शिक्षण में बच्चे जल्दी ऊब जाते हैं, लेकिन नवाचार से शिक्षा खेल-खेल में हो जाती है।
जैसे – खेल, चार्ट, मॉडल, वीडियो, स्मार्ट क्लास इत्यादि से बच्चे सीखने में रुचि लेने लगते हैं।
3. रचनात्मकता और सोचने की क्षमता विकसित करता है
नवीन शिक्षण विधियों से बच्चे केवल याद नहीं करते बल्कि स्वयं सोचने, प्रश्न पूछने और समाधान खोजने की आदत विकसित करते हैं।
इससे उनका सर्वांगीण विकास होता है।
4. शिक्षक की दक्षता (Efficiency) बढ़ती है
शैक्षिक नवाचार से शिक्षक अपनी शिक्षण शैली में सुधार कर सकते हैं।
वे नई तकनीक और तरीकों का उपयोग कर कक्षा को अधिक सजीव, आकर्षक और प्रभावशाली बना सकते हैं।
5. शिक्षा की गुणवत्ता में सुधार होता है
जब शिक्षण पद्धतियाँ नई और आधुनिक होती हैं तो शिक्षा की गुणवत्ता बढ़ती है।
बच्चे विषयों को गहराई से समझते हैं और परीक्षा में अच्छा प्रदर्शन करते हैं।
6. समय और संसाधनों का बेहतर उपयोग होता है
नई तकनीकों (जैसे — डिजिटल बोर्ड, ऑडियो-वीडियो माध्यम, ई-लर्निंग) से कम समय में अधिक ज्ञान दिया जा सकता है।
इससे शिक्षण प्रक्रिया तेज और प्रभावी बनती है।
7. शिक्षा को आधुनिक समाज की आवश्यकताओं के अनुरूप बनाता है
आज के समय में समाज, विज्ञान और तकनीक बहुत तेजी से बदल रहे हैं।
शैक्षिक नवाचार इन परिवर्तनों के अनुसार शिक्षा को अप-टू-डेट और उपयोगी बनाते हैं।
8. समस्या समाधान में मदद करता है
कक्षा या विद्यालय में आने वाली विभिन्न समस्याओं (जैसे – अनुशासन, उपस्थिति, परिणाम) को दूर करने के लिए शिक्षक नए उपाय और प्रयोग करते हैं, जिससे समस्याएँ आसानी से हल होती हैं।
💡 निष्कर्ष (Conclusion)
शैक्षिक नवाचार आज की शिक्षा की आत्मा है।
इसके माध्यम से शिक्षा को जीवंत, आधुनिक और प्रभावशाली बनाया जा सकता है।
यह न केवल शिक्षकों की योग्यता बढ़ाता है बल्कि विद्यार्थियों के सर्वांगीण विकास में भी सहायक होता है।
अतः शिक्षा में निरंतर नवाचार आवश्यक है ताकि समाज और समय की बदलती आवश्यकताओं के अनुसार शिक्षा प्रगतिशील बनी रहे।
शिक्षण, अधिगम और मूल्यांकन के संबंध पर प्रकाश डालिए”
शिक्षण, अधिगम एवं मूल्यांकन के संबंध पर प्रकाश डालिए
🌿 1. प्रस्तावना (Introduction):
शिक्षण, अधिगम और मूल्यांकन — शिक्षा प्रक्रिया के तीन मुख्य आधार हैं।
ये तीनों एक-दूसरे से गहराई से जुड़े हुए हैं।
शिक्षण से अधिगम होता है और अधिगम का पता मूल्यांकन से चलता है।
इनके बिना शिक्षा प्रक्रिया अधूरी मानी जाती है।
📗 2. अर्थ (Meaning):
-
शिक्षण (Teaching):
शिक्षक द्वारा विद्यार्थियों को ज्ञान, कौशल और मूल्य प्रदान करने की प्रक्रिया। -
अधिगम (Learning):
विद्यार्थियों द्वारा ज्ञान ग्रहण करने, समझने और व्यवहार में परिवर्तन लाने की प्रक्रिया। -
मूल्यांकन (Evaluation):
विद्यार्थियों द्वारा अर्जित ज्ञान व कौशल की जांच या माप करने की प्रक्रिया।
📘 3. तीनों के बीच संबंध (Relationship):
-
शिक्षण से अधिगम उत्पन्न होता है
जब शिक्षक प्रभावी ढंग से पढ़ाता है, तो विद्यार्थी नया ज्ञान सीखता है।
अच्छा शिक्षण ही अच्छे अधिगम की नींव है। -
अधिगम का मूल्यांकन से पता चलता है
विद्यार्थी ने क्या सीखा और कितना सीखा — इसका पता परीक्षा या मूल्यांकन से चलता है। -
मूल्यांकन से शिक्षण में सुधार होता है
मूल्यांकन के परिणाम देखकर शिक्षक अपने शिक्षण तरीकों में सुधार कर सकता है।
इस प्रकार मूल्यांकन, शिक्षण को और प्रभावी बनाता है।
📊 4. तीनों का आपसी क्रम (Flow Relationship):
शिक्षण → अधिगम → मूल्यांकन → पुनः शिक्षण में सुधार
शिक्षक पढ़ाता है → विद्यार्थी सीखता है → मूल्यांकन से परिणाम मिलता है → सुधार होता है।
🌼 5. निष्कर्ष (Conclusion):
शिक्षण, अधिगम और मूल्यांकन — शिक्षा प्रक्रिया के तीन आवश्यक चरण हैं।
तीनों एक-दूसरे के बिना अधूरे हैं।
शिक्षण अधिगम को जन्म देता है, अधिगम का आकलन मूल्यांकन करता है,
और मूल्यांकन से शिक्षण में सुधार संभव होता है।
अतः ये तीनों शिक्षा की गुणवत्ता बढ़ाने में समान रूप से आवश्यक हैं।
📍याद रखने योग्य पंक्ति:
“शिक्षण बिना अधिगम अधूरा है,
अधिगम बिना मूल्यांकन अर्थहीन है —
और मूल्यांकन बिना शिक्षण निष्फल है।”
अच्छे परीक्षण की तकनीकी कसौटियाँ (Technical Qualities of a Good Test)
किसी भी परीक्षा या टेस्ट को “अच्छा परीक्षण” तभी कहा जाता है
जब वह विद्यार्थी की वास्तविक क्षमता को सही और भरोसेमंद रूप से माप सके।
इसके लिए कुछ मुख्य तकनीकी कसौटियाँ (Technical Criteria) होती हैं 👇
🌿 1. विश्वसनीयता (Reliability)
👉 मतलब — परीक्षण के परिणाम स्थिर और भरोसेमंद हों।
यानि अगर वही टेस्ट दोबारा लिया जाए तो लगभग वही परिणाम मिले।
उदाहरण:
अगर कोई छात्र दो बार वही टेस्ट दे और दोनों बार लगभग समान अंक पाए,
तो वह टेस्ट विश्वसनीय कहलाएगा।
🟢 याद रखने योग्य शब्द:
"बार-बार लेने पर भी परिणाम एक जैसा — यही विश्वसनीयता है।"
🌿 2. वैधता (Validity)
👉 मतलब — टेस्ट वही चीज़ मापे जिसके लिए बनाया गया है।
अगर टेस्ट गणित की क्षमता मापने के लिए है,
तो उसमें केवल गणित से संबंधित प्रश्न ही हों,
न कि हिंदी या सामान्य ज्ञान के।
🟢 याद रखने योग्य शब्द:
"जो मापना है, वही मापे — यही वैधता है।"
🌿 3. वस्तुनिष्ठता (Objectivity)
👉 मतलब — जाँच में व्यक्तिगत मत या पक्षपात का असर न हो।
दो शिक्षक अगर एक ही उत्तरपुस्तिका जांचें,
तो दोनों के अंक लगभग समान आने चाहिए।
यानी परिणाम पर जांचकर्ता की राय का प्रभाव न पड़े।
🟢 याद रखने योग्य शब्द:
"जिसे भी जांचो, परिणाम एक जैसा आए — यही वस्तुनिष्ठता है।"
🌿 4. व्यावहारिकता (Practicability)
👉 मतलब — टेस्ट लेना, जांचना और लागू करना आसान हो।
ज्यादा समय, पैसा या संसाधन न लगें।
टेस्ट की तैयारी और संचालन सरल हो।
🟢 याद रखने योग्य शब्द:
"आसान, सस्ता और समय पर — वही व्यावहारिक परीक्षण।"
🌿 5. विभेदन शक्ति (Discriminating Power)
👉 मतलब — अच्छे और कमजोर विद्यार्थियों में फर्क बताने की क्षमता।
टेस्ट ऐसा होना चाहिए जिससे पता चले
कौन विद्यार्थी विषय को अच्छे से समझता है और कौन नहीं।
🟢 याद रखने योग्य शब्द:
"जो अच्छे और कमजोर में अंतर दिखाए — वही अच्छा टेस्ट।"
🌿 6. व्यापकता (Comprehensiveness)
👉 मतलब — टेस्ट पूरे पाठ्यक्रम को कवर करे,
सिर्फ एक-दो अध्याय या भाग को नहीं।
इससे विद्यार्थी की सम्पूर्ण जानकारी मापी जा सके।
🟢 याद रखने योग्य शब्द:
"पूरा पाठ्यक्रम शामिल — यही व्यापकता।"
💡 संक्षेप में (Short Table):
| क्रमांक | कसौटी | अर्थ (Easy Meaning) |
|---|---|---|
| 1 | विश्वसनीयता | परिणाम भरोसेमंद हों |
| 2 | वैधता | वही मापे जिसके लिए बनाया गया |
| 3 | वस्तुनिष्ठता | जाँच में पक्षपात न हो |
| 4 | व्यावहारिकता | टेस्ट लेना आसान हो |
| 5 | विभेदन शक्ति | अच्छे- कमजोर में फर्क बताए |
| 6 | व्यापकता | पूरा पाठ्यक्रम शामिल करे |
🌼 निष्कर्ष (Conclusion):
एक अच्छा परीक्षण वही है जो विश्वसनीय, वैध, वस्तुनिष्ठ, व्यावहारिक, विभेदी और व्यापक हो।
ऐसा परीक्षण ही विद्यार्थियों की वास्तविक योग्यता का सही मूल्यांकन कर सकता है।
सतत और वार्षिक मूल्यांकन में पुनर्बलन (Reinforcement) से क्या तात्पर्य है?
(Long Question Answer – आसान और स्पष्ट भाषा में)
💡 परिचय:
शिक्षा का मुख्य उद्देश्य केवल ज्ञान देना नहीं, बल्कि बच्चे के सर्वांगीण विकास को सुनिश्चित करना होता है।
इसी उद्देश्य को पूरा करने के लिए विद्यालयों में सतत और व्यापक मूल्यांकन (CCE – Continuous and Comprehensive Evaluation) प्रणाली लागू की गई है।
इसमें विद्यार्थियों की सीखने की प्रक्रिया का लगातार मूल्यांकन किया जाता है ताकि उनकी कमजोरियों को पहचाना जा सके और सुधार किया जा सके।
📘 पुनर्बलन (Reinforcement) का अर्थ:
पुनर्बलन का मतलब होता है —
“सीखे हुए ज्ञान, कौशल या व्यवहार को और मजबूत बनाना।”
यानी जब किसी विद्यार्थी ने कोई अच्छा कार्य किया, सही उत्तर दिया, या सीखने में प्रगति दिखाई,
तो शिक्षक उसकी सराहना, प्रोत्साहन, या सहायता करके उस व्यवहार को और पक्का करते हैं —
इसी प्रक्रिया को पुनर्बलन कहा जाता है।
🎯 सतत और वार्षिक मूल्यांकन में पुनर्बलन का उद्देश्य:
सतत मूल्यांकन में पुनर्बलन का उद्देश्य केवल अंक देना नहीं, बल्कि बच्चे की सीखने की प्रक्रिया को सकारात्मक दिशा में आगे बढ़ाना होता है।
मुख्य उद्देश्य हैं —
-
विद्यार्थियों में आत्मविश्वास बढ़ाना।
-
उन्हें सही दिशा में प्रेरित करना।
-
गलतियों को सुधारने का अवसर देना।
-
सीखी हुई बातों को स्थायी रूप से मन में बिठाना।
-
निरंतर प्रगति की भावना पैदा करना।
🧩 पुनर्बलन के प्रकार:
-
सकारात्मक पुनर्बलन (Positive Reinforcement):
-
जब शिक्षक विद्यार्थी के अच्छे कार्य या उत्तर की प्रशंसा, इनाम या प्रोत्साहन करते हैं।
-
उदाहरण – “बहुत अच्छा किया!”, “शाबाश!”, “तुमने सही उत्तर दिया।”
➤ इससे बच्चे में उत्साह और रुचि बढ़ती है।
-
-
नकारात्मक पुनर्बलन (Negative Reinforcement):
-
जब विद्यार्थी को गलतियों से सीखने और सुधारने का अवसर दिया जाता है।
-
इसमें डांटने की बजाय समझाया जाता है कि कहाँ गलती हुई और कैसे सुधारी जा सकती है।
-
🧠 सतत मूल्यांकन में पुनर्बलन की भूमिका:
-
शिक्षक हर गतिविधि के बाद बच्चों को फीडबैक देते हैं।
-
कक्षा कार्य, गृह कार्य, प्रोजेक्ट, मौखिक परीक्षा, खेल, कला आदि के माध्यम से विद्यार्थी की प्रगति देखी जाती है।
-
जो विद्यार्थी पीछे रह जाते हैं, उन्हें अतिरिक्त सहयोग (Remedial Teaching) दिया जाता है।
-
इस तरह पुनर्बलन से सीखने की प्रक्रिया लगातार चलती रहती है।
🌱 निष्कर्ष:
इस प्रकार,
सतत और वार्षिक मूल्यांकन में पुनर्बलन का तात्पर्य है —
विद्यार्थियों के सीखने के अनुभव को निरंतर प्रोत्साहन, मार्गदर्शन और सुधार के माध्यम से मजबूत बनाना।
यह केवल अंक देने की प्रक्रिया नहीं, बल्कि सीखने को स्थायी और आनंददायक बनाने की विधि है।
रचनात्मक मूल्यांकन और आक्लित मूल्यांकन में अंतर
परिचय:
मूल्यांकन (Evaluation) शिक्षा की वह प्रक्रिया है जिसके द्वारा विद्यार्थी की सीखने की क्षमता, उपलब्धि और व्यवहार में हुए परिवर्तन का पता लगाया जाता है।
मूल्यांकन के दो प्रमुख प्रकार होते हैं —
1️⃣ रचनात्मक मूल्यांकन (Formative Evaluation)
2️⃣ आक्लित मूल्यांकन (Summative Evaluation)
🧩 1. रचनात्मक मूल्यांकन (Formative Evaluation):
रचनात्मक मूल्यांकन सीखने की प्रक्रिया के दौरान किया जाता है।
इसका उद्देश्य विद्यार्थियों की सीख को बेहतर बनाना और जहाँ कमी हो, वहाँ सुधार करना होता है।
इस मूल्यांकन के माध्यम से शिक्षक को यह पता चलता है कि विद्यार्थी कहाँ कठिनाई महसूस कर रहा है ताकि उसे समय रहते सहायता दी जा सके।
मुख्य बिंदु:
-
यह सतत और नियमित रूप से किया जाता है।
-
इसमें अंक देने के बजाय सुधार पर जोर दिया जाता है।
-
शिक्षक विद्यार्थियों की गलतियों को सुधारने के लिए सुझाव देता है।
-
यह विद्यार्थियों को अधिक आत्मविश्वास प्रदान करता है।
उदाहरण:
कक्षा कार्य, गृहकार्य, मौखिक परीक्षा, प्रश्नोत्तरी, प्रोजेक्ट आदि।
🧾 2. आक्लित मूल्यांकन (Summative Evaluation):
आक्लित मूल्यांकन किसी सत्र, इकाई या पाठ्यक्रम के अंत में किया जाता है।
इसका उद्देश्य यह जानना होता है कि विद्यार्थी ने पूरे पाठ्यक्रम में कितना सीखा है।
इस मूल्यांकन से विद्यार्थी की सीखने की अंतिम उपलब्धि का पता चलता है।
मुख्य बिंदु:
-
यह निश्चित समय पर किया जाता है।
-
इसका उद्देश्य अंतिम परिणाम का मापन होता है।
-
इसमें विद्यार्थियों को अंक या ग्रेड दिए जाते हैं।
-
यह विद्यार्थी के प्रदर्शन का सारांश प्रस्तुत करता है।
उदाहरण:
वार्षिक परीक्षा, बोर्ड परीक्षा, सेमेस्टर परीक्षा आदि।
📊 मुख्य अंतर तालिका के रूप में:
| क्रमांक | बिंदु | रचनात्मक मूल्यांकन | आक्लित मूल्यांकन |
|---|---|---|---|
| 1 | समय | सीखने की प्रक्रिया के दौरान | सत्र या पाठ्यक्रम के अंत में |
| 2 | उद्देश्य | सुधार और मार्गदर्शन देना | अंतिम परिणाम जानना |
| 3 | प्रकृति | सतत और नियमित | निश्चित समय पर किया जाता है |
| 4 | ध्यान | सुधार पर केंद्रित | प्रदर्शन पर केंद्रित |
| 5 | परिणाम | सुधार हेतु प्रतिक्रिया | अंक या ग्रेड |
| 6 | उदाहरण | गृहकार्य, प्रश्नोत्तरी, मौखिक परीक्षा | वार्षिक परीक्षा, बोर्ड परीक्षा |
🟢 निष्कर्ष:
रचनात्मक मूल्यांकन विद्यार्थियों के निरंतर विकास और सुधार में सहायक होता है,
जबकि आक्लित मूल्यांकन उनके सीखने के अंतिम परिणाम को दर्शाता है।
दोनों ही मूल्यांकन प्रकार शिक्षा प्रक्रिया के आवश्यक अंग हैं —
एक सुधार के लिए और दूसरा उपलब्धि को मापने के लिए।
परिचय:
शिक्षा में विद्यार्थियों के सीखने की प्रगति को जानने के लिए अलग-अलग प्रकार के परीक्षण (Test) लिए जाते हैं।
इनमें से दो महत्वपूर्ण प्रकार हैं —
-
निदानात्मक परीक्षण (Diagnostic Test)
-
उपलब्धि परीक्षण (Achievement Test)
दोनों का उद्देश्य विद्यार्थियों के ज्ञान का मूल्यांकन करना होता है,
लेकिन इनका उद्देश्य, समय और उपयोग अलग-अलग होता है।
📘 1. निदानात्मक परीक्षण (Diagnostic Test):
अर्थ:
‘निदानात्मक’ शब्द ‘निदान’ से बना है, जिसका अर्थ होता है — किसी गलती या कमजोरी का कारण पता लगाना।
👉 निदानात्मक परीक्षण वह परीक्षण है,
जिससे यह पता लगाया जाता है कि विद्यार्थी ने कहाँ गलती की, कहाँ कठिनाई आ रही है, और उसे कैसे सुधारा जा सकता है।
उद्देश्य:
विद्यार्थियों की सीखने की कमजोरियों का पता लगाना और सुधार के उपाय करना।
कब लिया जाता है:
जब विद्यार्थी किसी विषय या टॉपिक को समझ नहीं पाता या बार-बार गलती करता है,
तब शिक्षक यह परीक्षण लेते हैं ताकि कारण पता चले।
उदाहरण:
-
किसी विद्यार्थी को “भाग” (Division) में गलती होती है,
तो शिक्षक उसी विषय पर एक छोटा टेस्ट लेते हैं कि वह कहाँ गलती कर रहा है। -
यह टेस्ट गलती का कारण बताता है — समझ की कमी, अभ्यास की कमी, या ध्यान की कमी।
📗 2. उपलब्धि परीक्षण (Achievement Test):
अर्थ:
‘उपलब्धि’ का मतलब होता है – जो विद्यार्थी ने सीखा है या प्राप्त किया है।
👉 उपलब्धि परीक्षण वह परीक्षण है,
जिससे यह जाना जाता है कि विद्यार्थी ने किसी विषय, अध्याय या कोर्स से कितना सीखा और कितना याद रखा है।
उद्देश्य:
विद्यार्थी के शैक्षणिक प्रदर्शन (Academic Performance) का मूल्यांकन करना।
कब लिया जाता है:
आमतौर पर किसी अध्याय, इकाई, या सत्र के अंत में लिया जाता है।
जैसे – यूनिट टेस्ट, अर्धवार्षिक परीक्षा, वार्षिक परीक्षा आदि।
उदाहरण:
-
गणित का यूनिट टेस्ट
-
वार्षिक परीक्षा
-
बोर्ड परीक्षा
इनसे यह पता चलता है कि विद्यार्थी ने कितना सीखा और अंक प्राप्त किए।
⚖️ निदानात्मक और उपलब्धि परीक्षण में अंतर:
| क्रमांक | आधार | निदानात्मक परीक्षण | उपलब्धि परीक्षण |
|---|---|---|---|
| 1 | उद्देश्य | गलती या कमजोरी का कारण जानना | विद्यार्थी की उपलब्धि मापना |
| 2 | समय | सीखने की प्रक्रिया के बीच या बाद में | अध्याय या सत्र के अंत में |
| 3 | स्वरूप | छोटा, विशिष्ट विषय पर आधारित | लंबा, पूरे पाठ्यक्रम पर आधारित |
| 4 | परिणाम का उपयोग | सुधार और पुनःअध्यापन के लिए | अंक देने या ग्रेड तय करने के लिए |
| 5 | उद्देश्य की प्रकृति | सुधारात्मक (Remedial) | मूल्यांकनात्मक (Evaluative) |
| 6 | किसके लिए उपयोगी | शिक्षक और विद्यार्थी दोनों के लिए | मुख्यतः मूल्यांकन और रिपोर्ट कार्ड के लिए |
🧠 संक्षेप में अंतर (In Simple Words):
-
निदानात्मक परीक्षण = “गलती कहाँ है, यह जानने वाला टेस्ट।”
-
उपलब्धि परीक्षण = “कितना सीखा गया है, यह बताने वाला टेस्ट।”
🌱 निष्कर्ष:
निदानात्मक और उपलब्धि परीक्षण दोनों ही शिक्षा के महत्वपूर्ण भाग हैं।
निदानात्मक परीक्षण से विद्यार्थी की कमजोरियों का पता चलता है और सुधार किया जा सकता है,
जबकि उपलब्धि परीक्षण से उसकी सीखने की सफलता या प्रगति का पता चलता है।
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